शनिवार, 21 नवम्बर 2009

मानव संग्रहालय में "हबीब उत्सव"

हबीब तनवीर रंगमंच की ऎसी अज़ीम शख्सियत हैं जिन्होंने नाट्य शास्त्र में अपने तरह के नये अध्याय जोड़े । उन्होंने लोक कला और आधुनिक नाट्यकला का अनोखा संयोग कर कला संसार को चमत्कृत कर दिया । लोक परंपराओं की आत्मा को जीवित रखते हुए भी अपनी बात को थियेटर के ज़रिये आम जन तक पहुँचाया जा सकता है ये सहज ही साबित कर दिखाया हबीब तनवीर ने । हालाँकि अब वे नये थियेटर की अगुवाई करने के लिये मौजूद नहीं हैं , लेकिन उनका सृजन अब भी कलाजगत के लिये पथ प्रदर्शक है । हबीब तनवीर ने नया थियेटर के माध्यम से अपने नाटको में न केवल लोक और आदिवासी कलाकारों को अपने साथ जोड़ा बल्कि हाशिये पर रह रहे इन लोगों की आवाज़ अपने नाटकों में बुलंदी से उठाई । इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने हबीब साहब के नाटय संसार से कलाप्रेमियों को रुबरु कराने के लिये नया थियेटर के सहयोग से 21 से 26 नवम्बर 2009 तक छह दिवसीय `हबीब उत्सव´ का आयोजन किया है।

वीथि संकुल के अंतरंग सभागार में नया थियेटर के कलाकारों ने आगरा बाजार की प्रस्तुति दी । नाटक में बाज़ार में छाई मंदी से उबरने की तरकीब को प्रभावी और रोचक अंदाज़ में दिखाया गया है । कथानक के मुताबिक आगरा के बाज़ार में घोर मंदी छाई है और कुछ भी नहीं बिक रहा। एक ककड़ी वाले के दिमाग में यह बात आती है कि यदि कोई कवि उसकी ककड़ी के गुणों को बखानती कविता लिख दे तो बिक्री ज़रूर बढ़ेगी। वो कई शायरों के पास जाता है पर कोई भी इस काम के लिए राज़ी नहीं होता। अंत में वह शायर नज़ीर के पास जाता है जो फौरन उसका काम कर देते हैं। वह नज़ीर की लिखी ककड़ी पर कविता गाता हुआ आता है और उसके यहां ग्राहकों की भीड़ लग जाती है। फिर तो लड्डूवाला, तरबूज वाला आदि सब एक-एक करके वही करते हैं और जल्दी ही सारा बाज़ार नज़ीर के गीतों से गूँजने लगता है। इस मुख्य कथ्य के बीच एक बेरोजगार युवा की कहानी पिरोई गई है जो एक गणिका के फेर में पड़ा हुआ है और जो अंत में उसी पुलिस इन्स्पेक्टर के हत्थे चढ़ता है जिसे कभी प्रेम के खेल में उसने परास्त किया था।´


हबीब तनवीर के कृतित्व पर एकाग्र इस आयोजन में नया थियेटर हबीब तनवीर के विभिन्न नाटकों की प्रस्तुति देगा । 22 नवम्बर को राज रक्त, 23 नवम्बर को सड़क एवं चरणदास चोर, 24 नवम्बर को जिन लाहौर नही वेख्या वो जन्म्या ही नही, 25 नवम्बर को कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना, तथा 26 नवम्बर को गौहाटी के बॉं-द क्रियेटिव ब्रीज थियेटर ग्रुप द्वारा चरण दास चोर की असमिया प्रस्तुति दी जायेगी। इनमें से `सडक´ की प्रस्तुति दिनांक 23 नवम्बर को पूर्वान्ह 9:30 बजे से तथा शेष नाटकों की प्रस्तुति संग्रहालय के अंतरंग भवन वीथि संकुल सभागार में प्रतिदिन शाम 6 बजे से होगी। इस अवसर पर 22 और 23 नवंबर को हबीब तनवीर पर केंद्रित संगोष्ठी `सुरता हबीब´ तथा 21 से 26 नवम्बर तक हबीब तनवीर के कृतित्व पर एकाग्र छायाचित्र प्रदर्शनी `यादे´ का संयोजन भी किया जायेगा।

शनिवार, 7 नवम्बर 2009

उससे इंटरनेट पर मिलो

उसके हाथ की लिखी
बरसों हुए कोई चिट्ठी नहीं मिली
नाज़ुक अँगुलियाँ
नेल पॉलिश के बिना
गुलाबी नाखून
सिंदूरी हथेलियों से शुरु होती
उसकी लरजती देह की
कल्पना किये बरसों बीत गये

पप्पी वह भी यदाकदा
मोबाइल पर लो-दो
उससे मिलना है,
तो इंटरनेट पर मिलो

एक औरत को औरत नहीं
मशीन में बदल दिया गया

यांत्रिक हुआ प्यार
कितने बुरे आ गये दिन
मोहब्बत एसएमएस हो गई

इश्क में ताजमहल बनवाना
अब बकवास होगी
इंटरनेट पर थोड़ी मेहनत करो
ज़िल्ले इलाही मुमताज़ खोज लो ।

पाठकों से विशेष निवेदन है कि रचना पसंद आने पर वे कवि श्री नरेन्द्र गौड़ को व्यक्तिगत रुप से अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करायें तो मेहरबानी होगी । जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कवि बेहद संवेदनशील होता है और तारीफ़ के चंद अल्फ़ाज़ उसका हौंसला कई गुना बढ़ा देते हैं । प्रशंसा के दो बोल कवि के लिये किसी ’संजीवनी" से कम नहीं । आप शब्दों को कागज़ पर उतारकर भी श्री गौड़ का उत्साह बढ़ाएँगे , इसका मुझे पूरा यकीन है ।
श्री गौड़ से ०९८२६५४८९६१ पर संपर्क किया जा सकता है । पत्र को उन तक पहुँचाने में ये कासिद की मदद कर सकता है-
४,रवीन्द्रनाथ टैगौर मार्ग,शाजापुर (मप्र)

शनिवार, 26 सितम्बर 2009

सुई-धागे से सजा रंग संसार


कशीदाकारी भारत का पुराना और बेहद खूबसूरत हुनर है । बेहद कम साधनों और नाममात्र की लागत के साथ शुरु किये जा सकने वाली इस कला के कद्रदान कम नहीं हैं । रंग बिरंगे धागों और महीन सी दिखाई देने वाली सुई की मदद से कल्पनालोक का ऎसा संसार कपड़े पर उभर आता है कि देखने वाले दाँतों तले अँगुलियाँ दबा लें । लखनऊ की चिकनकारी,बंगाल के काँथा और गुजरात की कच्छी कढ़ाई का जादू हुनर के शौकीनों के सिर चढ़कर बोलता है। इन सबके बीच सिंध की कशीदाकारी की अलग पहचान है ।

तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में जबकि हर काम मशीनों से होने लगा है, सिंधी कशीदाकारों की कारीगरी "हरमुचो" किसी अजूबे से कम नज़र नहीं आती । बारीक काम और चटख रंगों का अनूठा संयोजन सामान्य से वस्त्र को भी आकर्ष्क और खास बना देता है । हालाँकि वक्त की गर्द इस कारीगरी पर भी जम गई है । नई पीढ़ी को इस हुनर की बारीकियाँ सिखाने के लिये भोपाल के राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने पहचान कार्यक्रम के तहत हरमुचो के कुशल कारीगरों को आमंत्रित किया । इसमें सरला सोनेजा, कविता चोइथानी और रचना रानी सोनेजा ने हरमुचो कला के कद्रदानों को सुई-धागे से रचे जाने वाले अनोखे संसार के दर्शन कराये ।

हुरमुचो सिंधी भाषा का शब्द है जिसका शब्दिक अर्थ है कपड़े पर धागों को गूंथ कर सज्जा करना। हुरमुचो भारत की प्राचीन और पारम्परिक कशीदा शैलियों में से एक है। अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में प्रचलित होने के कारण इसे सिंधी कढ़ाई भी कहते हैं। सिंध प्रांत की खैरपुर रियासत और उसके आस-पास के क्षेत्र हरमुचो के जानकारों के गढ़ हुआ करते थे। यह कशीदा प्रमुख रूप से कृषक समुदायों की स्त्रियाँ फसल कटाई के उपरान्त खाली समय में अपने वस्त्रों की सज्जा के लिये करती थीं। आजादी के साथ हुए बँटवारे में सिंध प्रांत पाकिस्तान में चला गया किंतु वह कशीदा अब भी भारत के उन हिस्सों में प्रचलित है, जो सिंध प्रान्त के सीमावर्ती क्षेत्र हैं। पंजाब के मलैर कोटला क्षेत्र, राजस्थान के श्री गंगानगर, गुजरात के कच्छ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर तथा मध्य प्रदेश के ग्वालियर में यह कशीदा आज भी प्रचलन में है।

हुरमुचो कशीदा को आधुनिक भारत में बचाए रखने का श्रेय सिंधी समुदाय की वैवाहिक परंपराओं को जाता है। सिंधियों में विवाह के समय वर के सिर पर एक सफेद कपड़ा जिसे ’बोराणी’ कहते है, को सात रंगो द्वारा सिंधी कशीदे से अलंकृत किया जाता है। आज भी यह परम्परा विद्यमान है। सिंधी कशीदे की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें डिजाइन का न तो कपड़े पर पहले कोई रेखांकन किया जाता है और न ही कोई ट्रेसिंग ही की जाती है। डिजाइन पूर्णतः ज्यामितीय आकारों पर आधारित और सरल होते हैं। जिन्हें एक ही प्रकार के टांके से बनाया जाता है जिसे हुरमुचो टांका कहते हैं। यह दिखने में हैरिंघ बोन स्टिच जैसा दिखता है परंतु होता उससे अलग है।

पारम्परिक रूप से हुरमुचो कशीदा वस्त्रों की बजाय घर की सजावट और दैनिक उपयोग में आने वाले कपड़ों में अधिक किया जाता था। चादरों,गिलाफों,रूमाल,बच्चों के बिछौने,थालपोश,थैले आदि इस कशीदे से सजाए जाते थे । बाद में बच्चों के कपड़े, पेटीकोट, ओढ़नियों आदि पर भी हरमुचो ने नई जान भरना शुरु कर दिया । आजकल सभी प्रकार के वस्त्रों पर यह कशीदा किया जाने लगा है।

मैटी कशीदे की तरह सिंधी कशीदे में कपड़े के धागे गिन कर टांकों और डिजाइन की एकरूपता नहीं बनाई जाती। इसमें पहले कपड़े पर डिजाइन को एकरूपता प्रदान करने के लिए कच्चे टाँके लगाए जाते हैं। जो डिजाइन को बुनियादी आकार बनाते हैं। सिंधी कशीदा हर किस्म के कपड़े पर किया जा सकता है। सिंधी कशीदे के डिजाइन अन्य पारम्परिक कशीदो से भिन्न होते हैं।

बुधवार, 10 जून 2009

पंद्रह राज्यों की लोक संस्कृति भोपाल में

आधुनिक जीवन शैली में हमारी संस्कृति कहीं पीछे छूट गई है । वन क्षेत्रों में रहकर अपनी परंपराओं को सहेजने वाले जनजातीय लोग भी इस बदलाव से अछूते नहीं रहे हैं । सरकारी योजनाओं के माध्यम से शहरी चमक-दमक सुदूर अंचलों में पैठ बनाने लगी है और अब लोकगीत- संगीत,परंपरा,वेशभूषा,खानपान,रहन-सहन सब कुछ आधुनिक हो चला है । लोक संस्कृति को बचाये रखने के लिये अब सरकारी स्तर पर प्रयास शुरु किये गये हैं ।

भोपाल का इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय देश की विभिन्न जनजातियों के शिल्प और कला को संजोने और सहेजने के काम में लगा है । समृद्ध लोक संस्कृति से लोगों को रुबरु कराने के लिये संग्रहालय ने इंटरएक्टिव वीडियो प्रादर्श की व्यवस्था की है । ’वाचा’ नाम से शुरु किये गये इस प्रादर्श में 15 राज्यों की संस्कृति की झलक छायाचित्रों,मिथकों,कहानियों,नृत्यों और गीत-संगीत की मदद से देखी जा सकती है ।
सात टच स्क्रीन कियोस्क से सजा यह यह प्रादर्श नेशनल कन्सोर्टियम ऑफ़ ट्रायबल आर्ट एंड कल्चर परियोजना के तहत विकसित किया गया है । इस सुविधा को दर्शकों के लिये शुरु करने के मौके को असम की सुप्रसिद्ध नृत्यांगना सविता सैकिया और भोपाल की बिन्दु जुनेजा की नयनाभिराम प्रस्तुति ने यादगार बना दिया |

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

जनजातीय गहनों के आगे फ़ीकी सोने की चमक




आभूषण हमेशा से ही स्त्री की कमज़ोरी माने जाते हैं । फ़िर चाहे वो सम्पन्न परिवार से ताल्लुक रखे या प्रकृति की गोद में जीवन गुज़ारने वाली काननबाला ही क्यों ना हो । हालाँकि कवियों , साहित्यकारों और कलाकारों की निगाह में गहने कभी कीमती नहीं रहे । गुणों और आत्मिक सौंदर्य को तरजीह देने वालों ने हमेशा ही इन अलंकारों को दोयम दर्ज़े का माना, मगर फ़िर भी गहनों की अहमियत एक स्त्री के जीवन में कभी कम नहीं हो सकी । आभूषण नारी संवेदनाओं की तीव्र अभिव्यक्ति भी हैं ।

जंगल, ज़मीन, पेड़, झरने, नदी, तालाब को जीवन से जोड़कर देखने वाले आदिवासी मानते हैं कि सौंदर्य वस्त्रों या आभूषणों से नहीं स्वस्थ शरीर से है । इसीलिये मौसम के बदलते तेवरों से मुकाबले में उन्हें तन ढ़कने भर के लिये कपड़ों की दरकार होती है । वैसे तो वनबालाएँ शरीर पर गोदने गुदवाकर भी बेहद संतुष्ट रहती हैं । उनकी मान्यता है कि मृत्यु के बाद देह पर सजे गहने तो सांसारिकता के तकाज़े के कारण यहीं छूट जाना हैं, मगर गोदने मृत्यु के बाद भी देह का साथ नहीं छोड़ते ।

मुश्किल हालात में भी आनंदित रहने वाले आदिवासियों की कला और सुंदरता को परखने की समझ ही तो है, जो उसे पक्षियों के पंखों, कौड़ियों, सीपियों और फ़ूल-पत्तों से शरीर को सजाने में भी कोई हिचक नहीं है । इस सबके बावजूद आभूषणों को गढ़ने में वनवासियों के हुनर और सौंदर्य बोध की स्पष्ट छाप देखने मिलती है । आदिवासियों के गहने कई तरह के होते हैं । चाँदी ,काँसा ,पीतल ,कथील और ताँबे से इनके गहने बनते हैं । कानन बालाएँ गले में रंगबिरंगे मोतियों की तरह-तरह से गूँथी गई मालाएँ पहनती हैं , जिन्हें बनाने में ये अपनी नैसर्गिक कला और कल्पनाशीलता का जी भर कर उपयोग करती हैं ।

मध्यप्रदेश में गौंड स्त्रियों को आभूषणों से गहरा लगाव है । वे सौभाग्य के प्रतीक स्वरुप हाथ में चुरिया पहनती हैं । पटा बहुँटा, चुटकी तोड़ा , पैरी , हमेल , तरकी बारी , टिकुसी आदि गौंड महिलाओं के पारंपरिक अलंकरण हैं |भील जनजाति की महिलाएँ सिर से लेकर पैर तक गहनों से लदी रहती हैं । वे माथे पर बोर गूँथकर लड़ियाँ झुलाती हैं । कानों में झेले-झुमके और लड़ियाँ अलग से लटकाती हैं । पाँवों में पैंजनी की छनक ही भीलनी की मौजूदगी का एहसास कराती है ।

भील पुरूष भी आभूषणों के आकर्षण को नकार नहीं पाते । कान में चाँदी की लड़ें,कलाइयों में मोटे कड़े और कमर पर सजे चाँदी के कंदौरे भीलों को अलग पहचान देते हैं । इन्हें कमर और पैरों में घुँघरु पहनने से भी कोई गुरेज़ नहीं है ।

आदिवासी गले में हँसली, कण्ठी, लटकनियाँ, छूटा, हयकल, बन्धन हार, तागली, साकली मुरकी, कान में बाली, झुमके और कर्नफ़ूल, हाथों में चूड़ा, कंगना, बाकुड़ा, हाड़का, काकन,कड़ी कंगना, गजरिया, एठी, गेंदे ,गेंदे गजरे, लाख चूड़ा , पैर में तोडड, गुजरी , तोड़ा ,पैनजा ,पायल ,कामी , कड़े ,तोड़ा ,पैरी आदि आभूषणों का चलन देखा गया है । इन आभूषणों की पच्चीकारी और नक्काशी देखकर कारीगर के हुनर की दाद देना पड़ती है । अब ये गहने धीरे- धीरे चलन से बाहर होते जा रहे हैं । साथ ही इन्हें गढ़ने वाले कारीगरों की तलाश करना भी दुरुह हो गया है ।

महिलाओं के शरीर पर सजने वाले गहने अब संग्रहालय में प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह गये हैं । कला के कद्रदान नहीं रहे और खरीददारों ने भी मुँह फ़ेर लिया । उपेक्षित दस्तकारों ने रोज़ी - रोटी के लिये कोई और रोज़गार तलाश लिया । अब ये गहने केवल चित्रों में ही देखे जा सकते हैं ।

चित्र प्रदर्शनी लगाई गई है , भोपाल के श्यामला हिल्स स्थित आदिम जाति विकास और अनुसंधान संस्थान में । यहाँ संस्थान के छायाकार केशव ठाकुर के खींचे चित्र और कुछ आभूषण रखे गये हैं । मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के गौंड, भील, बैगा, भारिया, कोरकू, झारिया जनजाति के स्त्री-पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले अलंकरणों को प्रदर्शनी में शामिल किया गया है ।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

नाशुक्रे लोग

भोपाल की बड़ी झील सूख रही है । नेता ,अखबार और स्वयंसेवी संगठन मरते तालाब पर शोकमग्न हैं ,लेकिन ये अफ़सोस रस्म अदायगी बनकर रह गया है । तालाब गहरीकरण के नाम पर फ़ोटो सेशन का दौर चलता है। तालाब का पेट खाली है और सूख कर मैदान में तब्दील हो चुके हिस्से पर पूड़ी -पकवानों की दावत का दौर जारी है । सूखा तालाब शहर का सबसे हॉट पिकनिक स्पॉट हो गया है । तालाब की मौत के बाद उपजे हालात पर करारी चोट करते हुए कथाकार युगेश शर्मा ने पाँच लघु कथाएँ लिखी हैं । प्रस्तुत है इनमें से एक रचना -

शाम ढ़ल रही थी । बड़े तालाब के बीचोंबीच बाबा तकिया शाह की दरगाह के आसपास लगे पेड़ों से ढ़लते सूरज की छन-छन कर आ रही रश्मियाँ अच्छी लग रही थीं । दिन भर की लम्बी उड़ान के बाद अपने घरौंदों की ओर लौटते पँछियों का कलरव उनकी आपसी बतकही सा जान पड़ता था । तालाब के किनारों से रुठ चुके पानी का दूर तक कोई नामो निशान नहीं बचा , लेकिन सुरमई शाम में इक्का-दुक्का लोग अब भी कुदाली - फ़ावड़ा लेकर तालाब की नाराज़गी मिटाने की कोशिश में जुटे थे ।

अतिविशिष्ट लोग तो अक्सर सरकारी छुट्टी के दिन सुबह- सुबह ही आया करते हैं । शाम का कीमती वक्त तालाब की खुदाई जैसे टुच्चे काम के लिये ज़ाया करना उनके लिये अफ़ोर्डेबल नहीं होता । इन दिनों वैसे भी तालाब के गहरीकरण अभियान पर सुस्तीवाड़ा छाया हुआ है । आखिर पाँच साल में आने वाला चुनावी महोत्सव मनाना ज़्यादा ज़रुरी है , तालाब का क्या है ? कहाँ भागा जा रहा है ? जितना सूखेगा , उतना ही फ़ायदेमंद ।

अँधेरा पैर पसार ही रहा था , तभी वहाँ सनसनाता हुआ बवंडर छा गया । बवंडर में एक आक्रोश से भरी हुई मानव आकृति नज़र आ रही थी । एक क्रोध भरी दहाड़ ने माहौल में अजीब सी दहशत भर दी । सन्नाटे को चीरते इस मानव आकृति के शब्द पिघले सीसे की तरह कान में उड़ेल दिये गये से जान पड़ते थे - " भोपाल के नाशुक्रे लोगों ! अपना अमृत जल पिला कर मैं तुम्हारी कई पीढ़ियों को जीवन देता रहा हूँ । मैंने उफ़ किये बगैर लाख तकलीफ़ें सहीं , मगर फ़िर भी कभी तुम्हारे गलों को प्यासा नहीं रहने दिया । तुमने पानी का बेरहमी से इस्तेमाल किया । ना मेरी देखभाल की और ना ही जर्जर होती काया को सुधारने - सँवारने की कोशिश की । आज जब मैं मृत्यु शैय्या पर हूँ तब भी तुम अपने छोटे- छोटे स्वार्थ पूरे करने में जुटे हो । मैं आज भी अपने लिये कुछ नहीं माँगता । फ़िक्रमंद हूँ तो सिर्फ़ तुम्हारे लिये और तुम्हारी आने वाली नस्लों के लिये । "

यह कहते-कहते वह मानव आकृति हाँफ़ने लगी । कुछ सुस्ताने के बाद उसने फ़िर बोलना शुरु किया । " अहसान फ़रामोशों मैं उम्मीद करता हूँ कि अब भी तुममें इंसानियत बाकी है । मुझे लगता है कि तुम्हारे आँख का पानी मरा नहीं होगा अभी तक ....। दूध का कर्ज़ तो सभी अदा करते हैं । अब पानी का फ़र्ज़ अदा करने का वक्त है । मुझे यकीन है , तुम अपने शहर की पहचान को यूँ ही तिल- तिल कर मरने नहीं दोगे । " इतना कहकर वह आवाज़ शून्य में कहीं विलीन हो गई । तालाब के चारों ओर फ़ैला अँधेरा और गहरा हो चुका था ....,मगर उम्मीदों की सुबह का इंतज़ार बाकी है ।

बृहस्पतिवार, 9 अप्रैल 2009

लालटेन,ढ़िबरी, चिमनी फ़िर याद आई

नरेन्द्र गौड़ का शब्द संसार जीवन से दूर जाती ज़िन्दगानी का मार्मिक वृतांत है । जब ज़िन्दगी से एहसास गुम होने लगते हैं और आनंद-उल्हास के पल-छिन मुरझाने से लगते हैं , तब नरेन्द्र के शब्द उन पर बारिश की पहली फ़ुहार से पड़कर नई जान फ़ूँक देते है , ऊर्जा से भर देते हैं । उनका ठेठ देसीपन ही आधुनिकता के खोखलेपन को ज़ुबान देता है ।

फ़िर याद आई लालटेन,ढ़िबरी, चिमनी
माचिस की तीली जल ना पाई बुझ गई
वह सीलन भरी कोठरी बहुत याद आई

याद आई संझा बाती,वह रँभाती गाय
खूँटा तोड़ने को बेताब एक बछिया याद आई
पश्चिम के माथे पर धूल का गुलाल
बैलगाड़ी की चररचूँ
बहुत याद आई

अभी तक नहीं लौटा देखो किधर गया
कित्ता बिगड़ गया छोकरा
लाठी टेकती जर्जर काया
पूछती फ़िर रही डगर-डगर
गुमशुदा वह आवाज़
बहुत याद आई

बहुत याद आया काँव-काँव करता पीपल
एक बीट कि मानो गिरी अभी-अभी सिर पर
बहुत याद आई बापू की वह मार
याद आई वह छड़ी, धमकी-घुड़की
इस कदर याद आई
हिचकियाँ लेने लगा रह-रह कर

न जाने कहाँ गई वह अठन्नी-चवन्नी
सलाम साहब के घिसे चेहरे वाली दुअन्नी
मोर का पँख,इमली का चिंया
खतरनाक नौ का पहाडा़
याद करना भूल जाना
एक स्लेट,पानी पोते की डिबिया
बहुत याद आई

सचमुच याद आई मास्टरजी की कूबडी़
हवा में झूलता मदरसे का बोर्ड
टाट पट्टी के टुकडे़ के लिये
जीवन-मरण का संघर्ष
हाथापाई करती नन्हीं हथेलियों की
गर्माहट बहुत याद आई

बिजली की लगातार कटौती के निर्मम दिनों में
लालटेन,ढ़िबरी, चिमनी और
जल नहीं पाई माचिस की तीली
बहुत याद आई
नरेन्द्र गौड़ ,शाजापुर