शुक्रवार, 13 फरवरी 2009

टेसू

दंगा हो रहा

शहर में

मन करता है

फ़ूलों पर फ़िर लिखूं कविताएं


हालांकि हास्यास्पद लगेगा

साइकिल के हैंडिल पर

लगाऊं सुर्ख डाली

कर्फ़्यू लगी गलियों से

चीखता हुआ गुज़रुं

मैं निहत्था कवि हूं

देवियों - सज्जनों !

टेसू खूब खिले

मार्च के महीने में ।

- नरेन्द्र गौड

[ मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के ’राम विलास शर्मा पुरस्कार’ से सम्मानित और नईदुनिया के शाजापुर ब्यूरो में कार्यरत पत्रकार]

1 टिप्पणियाँ:

mehek ने कहा…

bahut achhi lagi kavita