दंगा हो रहा
शहर में
मन करता है
फ़ूलों पर फ़िर लिखूं कविताएं
हालांकि हास्यास्पद लगेगा
साइकिल के हैंडिल पर
लगाऊं सुर्ख डाली
कर्फ़्यू लगी गलियों से
चीखता हुआ गुज़रुं
मैं निहत्था कवि हूं
देवियों - सज्जनों !
टेसू खूब खिले
मार्च के महीने में ।
- नरेन्द्र गौड
[ मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के ’राम विलास शर्मा पुरस्कार’ से सम्मानित और नईदुनिया के शाजापुर ब्यूरो में कार्यरत पत्रकार]
शुक्रवार, 13 फरवरी 2009
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1 टिप्पणियाँ:
bahut achhi lagi kavita
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