सोमवार, 23 फरवरी 2009

काँप उठे पहाड़

हवा ने
जब-जब भी
बजाई सीटी,
पेड़ों ने
बजाए बिगुल
और
काँप उठे पहाड़ ।

जानता है सोमारु
कि पेड़ों के
तमतमाए चेहरे
बता देते हैं
मौसम का हाल ।

यह भी
कि गुस्से से
टूट पड़ते हैं पेड़,
उभर आते हैं
अनगिनत घाव
पहाड़ों के सीनों पर ।

सोचता है सोमारु
कि सच है-
बड़े नहीं हैं पहाड़,
वे पेड़ बड़े हैं,
जो पहाड़ों की
छातियों पर
खड़े हैं ।
(लक्ष्मीनारायण पयोधि के काव्य संग्रह ’सोमारु’ से ली गई कृति)

6 टिप्पणियाँ:

mehek ने कहा…

bahut achhi kavita shukran

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर...

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत सुंदर. समारू से तो हम परिचित हैं. लेकिन वो कोई दूसरा ही है!

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया!!!

विष्णु बैरागी ने कहा…

बस्‍तर के जंगलों की सरसराहट सुनाई देती है इस कविता में।

somaru ने कहा…

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