पोटली लिए
गाँव से आई बहन को
पूरा एक माह हो गया
घर का रेशा - रेशा
ज़र्रा - ज़र्रा पूछ रहा है -
कब जाएगी बहन ?
जाएगी कब बहन
बीड़ियाँ फ़ूँकता रहता है
सब दिन बहन का पति
रिया - रिया करता है
बहन का बेटा
चिमलाई - सी बहन बीमार लगती है
जैसी भी लगे अपनी बला से
पत्नी पूछती है -
आपकी बहनजी कब जाएँगीं ?
बच्चे पूछते हैं यह औरत कब जाएगी ?
मैं भी बहन से पूछना चाहता हूँ
लेकिन गहरे गड्ढों में धँसीं
उसकी आँखों से
बाहर नहीं निकल पाता हूँ .....
( नरेन्द्र गौड़ के काव्य संग्रह ’ इतनी तो है जगह ’ से रिश्तों के रेशा -रेशा जज़्बात का आइना है ये शब्द चित्र )
गाँव से आई बहन को
पूरा एक माह हो गया
घर का रेशा - रेशा
ज़र्रा - ज़र्रा पूछ रहा है -
कब जाएगी बहन ?
जाएगी कब बहन
बीड़ियाँ फ़ूँकता रहता है
सब दिन बहन का पति
रिया - रिया करता है
बहन का बेटा
चिमलाई - सी बहन बीमार लगती है
जैसी भी लगे अपनी बला से
पत्नी पूछती है -
आपकी बहनजी कब जाएँगीं ?
बच्चे पूछते हैं यह औरत कब जाएगी ?
मैं भी बहन से पूछना चाहता हूँ
लेकिन गहरे गड्ढों में धँसीं
उसकी आँखों से
बाहर नहीं निकल पाता हूँ .....
( नरेन्द्र गौड़ के काव्य संग्रह ’ इतनी तो है जगह ’ से रिश्तों के रेशा -रेशा जज़्बात का आइना है ये शब्द चित्र )




3 टिप्पणियाँ:
सरिता जी
नरेन्द्र गौड़ की कविता "बहन जाएगी कब" में २१ वीं सदी के रिश्तों को उजागर किया है जिसमें एक ही माँ-बाप से जन्मी औलाद को भी एकाकी परिवार के अभ्यस्त लोग पराया ही समझते हैं., काश हम आज से २५ वर्ष पूर्व के परिवारों की कल्पना कर उनसे कुछ सीख लेते.
बहुत ही अच्छी कविता है.
- विजय
इस कविता में बहुत सही चित्र खीचा गया है आज के समाज का ... शुक्र है अभी तक भाई बहन का दर्द समझ रहा है .... वरना कुछ दिनों बाद वह भी नहीं रहेगा।
आज के रेशा रेशा हुए रिश्तों का यथार्थ चित्रण.
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