बुधवार, 4 मार्च 2009

बहन जाएगी कब

पोटली लिए
गाँव से आई बहन को
पूरा एक माह हो गया
घर का रेशा - रेशा
ज़र्रा - ज़र्रा पूछ रहा है -
कब जाएगी बहन ?
जाएगी कब बहन
बीड़ियाँ फ़ूँकता रहता है
सब दिन बहन का पति
रिया - रिया करता है
बहन का बेटा
चिमलाई - सी बहन बीमार लगती है
जैसी भी लगे अपनी बला से

पत्नी पूछती है -
आपकी बहनजी कब जाएँगीं ?
बच्चे पूछते हैं यह औरत कब जाएगी ?
मैं भी बहन से पूछना चाहता हूँ
लेकिन गहरे गड्ढों में धँसीं
उसकी आँखों से
बाहर नहीं निकल पाता हूँ .....

( नरेन्द्र गौड़ के काव्य संग्रह ’ इतनी तो है जगह ’ से रिश्तों के रेशा -रेशा जज़्बात का आइना है ये शब्द चित्र )

3 टिप्पणियाँ:

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" ने कहा…

सरिता जी
नरेन्द्र गौड़ की कविता "बहन जाएगी कब" में २१ वीं सदी के रिश्तों को उजागर किया है जिसमें एक ही माँ-बाप से जन्मी औलाद को भी एकाकी परिवार के अभ्यस्त लोग पराया ही समझते हैं., काश हम आज से २५ वर्ष पूर्व के परिवारों की कल्पना कर उनसे कुछ सीख लेते.
बहुत ही अच्छी कविता है.
- विजय

संगीता पुरी ने कहा…

इस कविता में बहुत सही चित्र खीचा गया है आज के समाज का ... शुक्र है अभी तक भाई बहन का दर्द समझ रहा है .... वरना कुछ दिनों बाद वह भी नहीं रहेगा।

Udan Tashtari ने कहा…

आज के रेशा रेशा हुए रिश्तों का यथार्थ चित्रण.