मंगलवार, 31 मार्च 2009

तुम मुझे मसीहा कर दो

कविता जनमानस की वाणी बन जाये तो उसका रचयिता जनकवि की उपाधि से स्वमेव सम्मानित हो जाता है । राजेन्द्र अनुरागी एक ऎसे ही जाने-पहचाने हस्ताक्षर रहे हैं । समाज उन्हें अलंकरणों और उपाधियों से विभूषित करता रहा ,मगर वे अपनी फ़क्कड़ अलमस्ती में ओज,श्रॄंगार और सामाजिक समता का गीत गुनगुनाते रहे ।

" तुम मुझे मत दो
तुम्हारे कीमती पत्थर मुझे मत दो
तुम मुझे मत दो
तुम्हारी बस्तियों में घर मुझे मत दो
मुझे अब आ गया है , उदधि में राहें
बना लेना

तुम मुझे मत दो
तुम्हारी कृपा के लंगर मुझे मत दो

अगर दे ही रहे हो , तो दो
मुझे सुकरात का जूठा ज़हर दो
सुजाता की खीर के दो भाग कर दो
बदन पर फ़टा चीवर दो

अगर दे ही रहे हो , तो दो
किसी बीमार का घर दो
निगाहों में दवा भर दो
तुम मुझे मसीहा कर दो

तुम मुझे मसीहा कर दो ।"

3 टिप्पणियाँ:

अल्पना वर्मा ने कहा…

अगर दे ही रहे हो , तो दो
मुझे सुकरात का जूठा ज़हर दो
सुजाता की खीर के दो भाग कर दो
बदन पर फ़टा चीवर दो

बहुत ही सुन्दर भाव हैं..

राजेन्द्र अनुरागी की लिखी यह कवीता ’तुम मुझे मसीहा कर दो’ एक स्वाभिमानी व्यक्ति के दिल की आवाज़ है.
धन्यवाद इस सुन्दर कविता हेतु.

Rajat Narula ने कहा…

अगर दे ही रहे हो , तो दो
मुझे सुकरात का जूठा ज़हर दो
सुजाता की खीर के दो भाग कर दो
बदन पर फ़टा चीवर दो

sunder rachna hai...

sneha ने कहा…

very nice. keep penning. you can also join merikhabar.com and can post your blogs.