
फ़िर याद आई लालटेन,ढ़िबरी, चिमनी
माचिस की तीली जल ना पाई बुझ गई
वह सीलन भरी कोठरी बहुत याद आई
याद आई संझा बाती,वह रँभाती गाय
खूँटा तोड़ने को बेताब एक बछिया याद आई
पश्चिम के माथे पर धूल का गुलाल
बैलगाड़ी की चररचूँ
बहुत याद आई
अभी तक नहीं लौटा देखो किधर गया
कित्ता बिगड़ गया छोकरा
लाठी टेकती जर्जर काया
पूछती फ़िर रही डगर-डगर
गुमशुदा वह आवाज़
बहुत याद आई
बहुत याद आया काँव-काँव करता पीपल
एक बीट कि मानो गिरी अभी-अभी सिर पर
बहुत याद आई बापू की वह मार
याद आई वह छड़ी, धमकी-घुड़की
इस कदर याद आई
हिचकियाँ लेने लगा रह-रह कर
न जाने कहाँ गई वह अठन्नी-चवन्नी
सलाम साहब के घिसे चेहरे वाली दुअन्नी
मोर का पँख,इमली का चिंया
खतरनाक नौ का पहाडा़
याद करना भूल जाना
एक स्लेट,पानी पोते की डिबिया
बहुत याद आई
सचमुच याद आई मास्टरजी की कूबडी़
हवा में झूलता मदरसे का बोर्ड
टाट पट्टी के टुकडे़ के लिये
जीवन-मरण का संघर्ष
हाथापाई करती नन्हीं हथेलियों की
गर्माहट बहुत याद आई
बिजली की लगातार कटौती के निर्मम दिनों में
लालटेन,ढ़िबरी, चिमनी और
जल नहीं पाई माचिस की तीली
बहुत याद आई
नरेन्द्र गौड़ ,शाजापुर




2 टिप्पणियाँ:
बहुत ही सुन्दर रचना है1अभार
वाह एक अच्छी कविता।
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