शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

जनजातीय गहनों के आगे फ़ीकी सोने की चमक




आभूषण हमेशा से ही स्त्री की कमज़ोरी माने जाते हैं । फ़िर चाहे वो सम्पन्न परिवार से ताल्लुक रखे या प्रकृति की गोद में जीवन गुज़ारने वाली काननबाला ही क्यों ना हो । हालाँकि कवियों , साहित्यकारों और कलाकारों की निगाह में गहने कभी कीमती नहीं रहे । गुणों और आत्मिक सौंदर्य को तरजीह देने वालों ने हमेशा ही इन अलंकारों को दोयम दर्ज़े का माना, मगर फ़िर भी गहनों की अहमियत एक स्त्री के जीवन में कभी कम नहीं हो सकी । आभूषण नारी संवेदनाओं की तीव्र अभिव्यक्ति भी हैं ।

जंगल, ज़मीन, पेड़, झरने, नदी, तालाब को जीवन से जोड़कर देखने वाले आदिवासी मानते हैं कि सौंदर्य वस्त्रों या आभूषणों से नहीं स्वस्थ शरीर से है । इसीलिये मौसम के बदलते तेवरों से मुकाबले में उन्हें तन ढ़कने भर के लिये कपड़ों की दरकार होती है । वैसे तो वनबालाएँ शरीर पर गोदने गुदवाकर भी बेहद संतुष्ट रहती हैं । उनकी मान्यता है कि मृत्यु के बाद देह पर सजे गहने तो सांसारिकता के तकाज़े के कारण यहीं छूट जाना हैं, मगर गोदने मृत्यु के बाद भी देह का साथ नहीं छोड़ते ।

मुश्किल हालात में भी आनंदित रहने वाले आदिवासियों की कला और सुंदरता को परखने की समझ ही तो है, जो उसे पक्षियों के पंखों, कौड़ियों, सीपियों और फ़ूल-पत्तों से शरीर को सजाने में भी कोई हिचक नहीं है । इस सबके बावजूद आभूषणों को गढ़ने में वनवासियों के हुनर और सौंदर्य बोध की स्पष्ट छाप देखने मिलती है । आदिवासियों के गहने कई तरह के होते हैं । चाँदी ,काँसा ,पीतल ,कथील और ताँबे से इनके गहने बनते हैं । कानन बालाएँ गले में रंगबिरंगे मोतियों की तरह-तरह से गूँथी गई मालाएँ पहनती हैं , जिन्हें बनाने में ये अपनी नैसर्गिक कला और कल्पनाशीलता का जी भर कर उपयोग करती हैं ।

मध्यप्रदेश में गौंड स्त्रियों को आभूषणों से गहरा लगाव है । वे सौभाग्य के प्रतीक स्वरुप हाथ में चुरिया पहनती हैं । पटा बहुँटा, चुटकी तोड़ा , पैरी , हमेल , तरकी बारी , टिकुसी आदि गौंड महिलाओं के पारंपरिक अलंकरण हैं |भील जनजाति की महिलाएँ सिर से लेकर पैर तक गहनों से लदी रहती हैं । वे माथे पर बोर गूँथकर लड़ियाँ झुलाती हैं । कानों में झेले-झुमके और लड़ियाँ अलग से लटकाती हैं । पाँवों में पैंजनी की छनक ही भीलनी की मौजूदगी का एहसास कराती है ।

भील पुरूष भी आभूषणों के आकर्षण को नकार नहीं पाते । कान में चाँदी की लड़ें,कलाइयों में मोटे कड़े और कमर पर सजे चाँदी के कंदौरे भीलों को अलग पहचान देते हैं । इन्हें कमर और पैरों में घुँघरु पहनने से भी कोई गुरेज़ नहीं है ।

आदिवासी गले में हँसली, कण्ठी, लटकनियाँ, छूटा, हयकल, बन्धन हार, तागली, साकली मुरकी, कान में बाली, झुमके और कर्नफ़ूल, हाथों में चूड़ा, कंगना, बाकुड़ा, हाड़का, काकन,कड़ी कंगना, गजरिया, एठी, गेंदे ,गेंदे गजरे, लाख चूड़ा , पैर में तोडड, गुजरी , तोड़ा ,पैनजा ,पायल ,कामी , कड़े ,तोड़ा ,पैरी आदि आभूषणों का चलन देखा गया है । इन आभूषणों की पच्चीकारी और नक्काशी देखकर कारीगर के हुनर की दाद देना पड़ती है । अब ये गहने धीरे- धीरे चलन से बाहर होते जा रहे हैं । साथ ही इन्हें गढ़ने वाले कारीगरों की तलाश करना भी दुरुह हो गया है ।

महिलाओं के शरीर पर सजने वाले गहने अब संग्रहालय में प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह गये हैं । कला के कद्रदान नहीं रहे और खरीददारों ने भी मुँह फ़ेर लिया । उपेक्षित दस्तकारों ने रोज़ी - रोटी के लिये कोई और रोज़गार तलाश लिया । अब ये गहने केवल चित्रों में ही देखे जा सकते हैं ।

चित्र प्रदर्शनी लगाई गई है , भोपाल के श्यामला हिल्स स्थित आदिम जाति विकास और अनुसंधान संस्थान में । यहाँ संस्थान के छायाकार केशव ठाकुर के खींचे चित्र और कुछ आभूषण रखे गये हैं । मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के गौंड, भील, बैगा, भारिया, कोरकू, झारिया जनजाति के स्त्री-पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले अलंकरणों को प्रदर्शनी में शामिल किया गया है ।

5 टिप्पणियाँ:

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत सुन्दर आलेख. यह सब तो मानव संग्रहालय में भी देखे जा सकते हैं. जनजातीय सभ्यता पर लगता है आपकी रुझान और पकड़ दोनों ही है. एक नयी श्रंखला उन वीथियों पर भी कर सकते हैं.

hem pandey ने कहा…

मैंने आधुनिक फैशन परस्त महिलाओं में भी पुराने पारंपरिक गहनों के प्रति रूचि देखी है. यह भी नए फैशन का तरीका है.

irdgird ने कहा…

हो सकता है कि कोई डिजायनर आपके आलेख से प्रेरणा लेकर इन आदिवासी कला में आधुनिकता का छोंका लगाकर बाजार में उतार दे।
बहुत अच्‍छी पोस्‍ट। पी एन सुब्रमनियम जी की प्रतिक्रिया पर गौर कीजिएगा।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

ग्रामीण अंचलों में पहने जाने गहनों के नाम भी दिए है आपने ग्रामीण क्षेत्र का गहन अध्ययन आपके लेख से झलक रहा है /लोक गीत ,लोक रीतिरिवास ,लोक गहनों की जानकारी एकत्रित कर सुरक्षित रखने योग्य लेखों में आपका यह लेख भी महत्त्व पूर्ण है

harishjharia ने कहा…

अति सुंदर आलेख है यह्। इसमें जनकारियां भी बहुत सारी हैं। जैसाकि आपने लिखा है अब कला के कद्रदान नहीं रहे।

- हरीश झारिया
http://harishjhariasblog.blogspot.com/2009/12/blog-post.html