शनिवार, 7 नवम्बर 2009

उससे इंटरनेट पर मिलो

उसके हाथ की लिखी
बरसों हुए कोई चिट्ठी नहीं मिली
नाज़ुक अँगुलियाँ
नेल पॉलिश के बिना
गुलाबी नाखून
सिंदूरी हथेलियों से शुरु होती
उसकी लरजती देह की
कल्पना किये बरसों बीत गये

पप्पी वह भी यदाकदा
मोबाइल पर लो-दो
उससे मिलना है,
तो इंटरनेट पर मिलो

एक औरत को औरत नहीं
मशीन में बदल दिया गया

यांत्रिक हुआ प्यार
कितने बुरे आ गये दिन
मोहब्बत एसएमएस हो गई

इश्क में ताजमहल बनवाना
अब बकवास होगी
इंटरनेट पर थोड़ी मेहनत करो
ज़िल्ले इलाही मुमताज़ खोज लो ।

पाठकों से विशेष निवेदन है कि रचना पसंद आने पर वे कवि श्री नरेन्द्र गौड़ को व्यक्तिगत रुप से अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करायें तो मेहरबानी होगी । जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कवि बेहद संवेदनशील होता है और तारीफ़ के चंद अल्फ़ाज़ उसका हौंसला कई गुना बढ़ा देते हैं । प्रशंसा के दो बोल कवि के लिये किसी ’संजीवनी" से कम नहीं । आप शब्दों को कागज़ पर उतारकर भी श्री गौड़ का उत्साह बढ़ाएँगे , इसका मुझे पूरा यकीन है ।
श्री गौड़ से ०९८२६५४८९६१ पर संपर्क किया जा सकता है । पत्र को उन तक पहुँचाने में ये कासिद की मदद कर सकता है-
४,रवीन्द्रनाथ टैगौर मार्ग,शाजापुर (मप्र)

1 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा ने कहा…

सरिता जी नरेन्द्र जी की सुंदर कविता हम तक पहुंचाने के लिये बहुत बहुत आभार