शनिवार, 21 नवम्बर 2009

मानव संग्रहालय में "हबीब उत्सव"

हबीब तनवीर रंगमंच की ऎसी अज़ीम शख्सियत हैं जिन्होंने नाट्य शास्त्र में अपने तरह के नये अध्याय जोड़े । उन्होंने लोक कला और आधुनिक नाट्यकला का अनोखा संयोग कर कला संसार को चमत्कृत कर दिया । लोक परंपराओं की आत्मा को जीवित रखते हुए भी अपनी बात को थियेटर के ज़रिये आम जन तक पहुँचाया जा सकता है ये सहज ही साबित कर दिखाया हबीब तनवीर ने । हालाँकि अब वे नये थियेटर की अगुवाई करने के लिये मौजूद नहीं हैं , लेकिन उनका सृजन अब भी कलाजगत के लिये पथ प्रदर्शक है । हबीब तनवीर ने नया थियेटर के माध्यम से अपने नाटको में न केवल लोक और आदिवासी कलाकारों को अपने साथ जोड़ा बल्कि हाशिये पर रह रहे इन लोगों की आवाज़ अपने नाटकों में बुलंदी से उठाई । इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने हबीब साहब के नाटय संसार से कलाप्रेमियों को रुबरु कराने के लिये नया थियेटर के सहयोग से 21 से 26 नवम्बर 2009 तक छह दिवसीय `हबीब उत्सव´ का आयोजन किया है।

वीथि संकुल के अंतरंग सभागार में नया थियेटर के कलाकारों ने आगरा बाजार की प्रस्तुति दी । नाटक में बाज़ार में छाई मंदी से उबरने की तरकीब को प्रभावी और रोचक अंदाज़ में दिखाया गया है । कथानक के मुताबिक आगरा के बाज़ार में घोर मंदी छाई है और कुछ भी नहीं बिक रहा। एक ककड़ी वाले के दिमाग में यह बात आती है कि यदि कोई कवि उसकी ककड़ी के गुणों को बखानती कविता लिख दे तो बिक्री ज़रूर बढ़ेगी। वो कई शायरों के पास जाता है पर कोई भी इस काम के लिए राज़ी नहीं होता। अंत में वह शायर नज़ीर के पास जाता है जो फौरन उसका काम कर देते हैं। वह नज़ीर की लिखी ककड़ी पर कविता गाता हुआ आता है और उसके यहां ग्राहकों की भीड़ लग जाती है। फिर तो लड्डूवाला, तरबूज वाला आदि सब एक-एक करके वही करते हैं और जल्दी ही सारा बाज़ार नज़ीर के गीतों से गूँजने लगता है। इस मुख्य कथ्य के बीच एक बेरोजगार युवा की कहानी पिरोई गई है जो एक गणिका के फेर में पड़ा हुआ है और जो अंत में उसी पुलिस इन्स्पेक्टर के हत्थे चढ़ता है जिसे कभी प्रेम के खेल में उसने परास्त किया था।´


हबीब तनवीर के कृतित्व पर एकाग्र इस आयोजन में नया थियेटर हबीब तनवीर के विभिन्न नाटकों की प्रस्तुति देगा । 22 नवम्बर को राज रक्त, 23 नवम्बर को सड़क एवं चरणदास चोर, 24 नवम्बर को जिन लाहौर नही वेख्या वो जन्म्या ही नही, 25 नवम्बर को कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना, तथा 26 नवम्बर को गौहाटी के बॉं-द क्रियेटिव ब्रीज थियेटर ग्रुप द्वारा चरण दास चोर की असमिया प्रस्तुति दी जायेगी। इनमें से `सडक´ की प्रस्तुति दिनांक 23 नवम्बर को पूर्वान्ह 9:30 बजे से तथा शेष नाटकों की प्रस्तुति संग्रहालय के अंतरंग भवन वीथि संकुल सभागार में प्रतिदिन शाम 6 बजे से होगी। इस अवसर पर 22 और 23 नवंबर को हबीब तनवीर पर केंद्रित संगोष्ठी `सुरता हबीब´ तथा 21 से 26 नवम्बर तक हबीब तनवीर के कृतित्व पर एकाग्र छायाचित्र प्रदर्शनी `यादे´ का संयोजन भी किया जायेगा।

शनिवार, 7 नवम्बर 2009

उससे इंटरनेट पर मिलो

उसके हाथ की लिखी
बरसों हुए कोई चिट्ठी नहीं मिली
नाज़ुक अँगुलियाँ
नेल पॉलिश के बिना
गुलाबी नाखून
सिंदूरी हथेलियों से शुरु होती
उसकी लरजती देह की
कल्पना किये बरसों बीत गये

पप्पी वह भी यदाकदा
मोबाइल पर लो-दो
उससे मिलना है,
तो इंटरनेट पर मिलो

एक औरत को औरत नहीं
मशीन में बदल दिया गया

यांत्रिक हुआ प्यार
कितने बुरे आ गये दिन
मोहब्बत एसएमएस हो गई

इश्क में ताजमहल बनवाना
अब बकवास होगी
इंटरनेट पर थोड़ी मेहनत करो
ज़िल्ले इलाही मुमताज़ खोज लो ।

पाठकों से विशेष निवेदन है कि रचना पसंद आने पर वे कवि श्री नरेन्द्र गौड़ को व्यक्तिगत रुप से अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करायें तो मेहरबानी होगी । जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कवि बेहद संवेदनशील होता है और तारीफ़ के चंद अल्फ़ाज़ उसका हौंसला कई गुना बढ़ा देते हैं । प्रशंसा के दो बोल कवि के लिये किसी ’संजीवनी" से कम नहीं । आप शब्दों को कागज़ पर उतारकर भी श्री गौड़ का उत्साह बढ़ाएँगे , इसका मुझे पूरा यकीन है ।
श्री गौड़ से ०९८२६५४८९६१ पर संपर्क किया जा सकता है । पत्र को उन तक पहुँचाने में ये कासिद की मदद कर सकता है-
४,रवीन्द्रनाथ टैगौर मार्ग,शाजापुर (मप्र)